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UKPEDIA MCQ

UKPEDIA MCQ में पाई गई कतिपय त्रुटियाँ जिन्हें सही किया जाना प्रत्येक पाठक के लिए अति आवश्यक है। कृपया अपने अमूल्य सुझाव भी दें। उत्तराखंड सामान्य ज्ञान के 5 महत्वपूर्ण प्रश्नों में आवश्यक सुधार उत्तराखंड सामान्य ज्ञान से संबंधित प्रश्नों के अध्ययन के दौरान निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तरों में सुधार आवश्यक पाया गया है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए संशोधित उत्तर नीचे दिए गए हैं। 1. टिहरी रियासत के अंतिम राजा पेज संख्या: 35 | प्रश्न संख्या: 57 प्रश्न: टिहरी रियासत के अंतिम राजा कौन थे? A. कीर्तिशाह B. भवानीशाह C. प्रतापशाह D. नरेन्द्रशाह सही उत्तर: मानवेन्द्र शाह मानवेन्द्र शाह ने अपने पिता नरेन्द्र शाह के बाद वर्ष 1946 में टिहरी गढ़वाल की गद्दी संभाली। वे टिहरी रियासत के अंतिम शासक थे। 1 अगस्त 1949 को टिहरी रियासत का भारत में विलय हुआ और राजशाही का अंत हो गया। 2. टिहरी रियासत का भारत में विलय पेज संख्या: 35 | प्रश्न स...

MCQ

प्रश्न 1 कथन – I : चन्द वंश के शासनकाल में ‘खालसा भूमि’ सीधे राज्य के नियंत्रण में रहती थी। कथन – II : खालसा भूमि से प्राप्त आय का उपयोग राज्य की सैन्य आवश्यकताओं में किया जाता था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (A) केवल कथन I (B) केवल कथन II (C) दोनों कथन I और II (D) न तो कथन I और न तो कथन II ✅ सही उत्तर : (C) दोनों कथन I और II व्याख्या : चन्द शासकों के काल में भूमि को विभिन्न श्रेणियों में बाँटा गया था। खालसा भूमि वह भूमि होती थी जिस पर सीधे राजा का अधिकार होता था और उससे प्राप्त राजस्व राज्य को मिलता था। इस आय का उपयोग मुख्यतः सेना के भरण-पोषण, किलों के निर्माण और प्रशासनिक खर्चों में किया जाता था। अतः दोनों कथन ऐतिहासिक रूप से सही हैं। प्रश्न 2 कथन – I : गोरखा काल में ‘बेगार प्रथा’ को व्यवस्थित रूप दिया गया। कथन – II : बेगार प्रथा के अंतर्गत जनता से बिना पारिश्रमिक श्रम लिया जाता था। (A) केवल कथन I (B) केवल कथन II (C) दोनों कथन I और II (D) न तो कथन I और न तो कथन II ✅ सही उत्तर : (C) दोनों कथन I और II व्याख्या : गोरखा शासन (1790–1815) में पहले से प्रचलित बेगार...

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1. भागीरथी नदी में गंगोत्री के निकट मिलने वाली सहायक नदी का नाम क्या है? (a) केदार गंगा (b) जाड़ गंगा (c) बिरही गंगा (d) सप्त गंगा 👉 उत्तर: (b) जाड़ गंगा 2. अलकनन्दा नदी में विष्णुप्रयाग पर कौन-सी नदी मिलती है? (a) नन्दाकिनी (b) धौलीगंगा (c) पिण्डर (d) मन्दाकिनी 👉 उत्तर: (b) धौलीगंगा 3. नन्दप्रयाग पर अलकनन्दा नदी में कौन-सी सहायक नदी मिलती है? (a) मन्दाकिनी (b) पिण्डर (c) नन्दाकिनी (d) जाड़ गंगा 👉 उत्तर: (c) नन्दाकिनी 4. कर्णप्रयाग पर अलकनन्दा में मिलने वाली नदी कौन-सी है? (a) मन्दाकिनी (b) पिण्डर (c) धौलीगंगा (d) टौंस 👉 उत्तर: (b) पिण्डर 5. रुद्रप्रयाग पर किन दो नदियों का संगम होता है? (a) अलकनन्दा–धौलीगंगा (b) भागीरथी–अलकनन्दा (c) अलकनन्दा–मन्दाकिनी (d) मन्दाकिनी–पिण्डर 👉 उत्तर: (c) अलकनन्दा–मन्दाकिनी 6. देवप्रयाग पर गंगा का निर्माण किन दो नदियों के संगम से होता है? (a) भागीरथी–मन्दाकिनी (b) अलकनन्दा–धौलीगंगा (c) भागीरथी–अलकनन्दा (d) जाड़ गंगा–भागीरथी 👉 उत्तर: (c) भागीरथी–अलकनन्दा 7. मन्दाकिनी नदी किस प्रयाग पर अलकनन्दा में मिलती है? (a) नन्दप्रयाग (b) कर्णप्रयाग (c) रुद्...

MCQ

1. निम्नलिखित में से कौन सा घाटी नगर (Valley Town) का उदाहरण है? (a) मसूरी (b) नैनीताल (c) श्रीनगर (d) लैंसडौन 👉 उत्तर: (c) श्रीनगर 2. निम्नलिखित में से कौन सा नगर पर्वतीय ढाल (Hill Slope Town) पर विकसित हुआ है? (a) देहरादून (b) हल्द्वानी (c) अल्मोड़ा (d) ऋषिकेश 👉 उत्तर: (c) अल्मोड़ा 3. उत्तराखण्ड का कौन सा नगर झील नगरी (Lake Town) के रूप में प्रसिद्ध है? (a) मसूरी (b) नैनीताल (c) पौड़ी (d) टिहरी 👉 उत्तर: (b) नैनीताल 4. निम्नलिखित में से कौन सा छावनी नगर (Cantonment Town) है? (a) श्रीनगर (b) लैंसडौन (c) रुद्रपुर (d) काशीपुर 👉 उत्तर: (b) लैंसडौन 5. देहरादून घाटी किस दो पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है? (a) शिवालिक–हिमाद्रि (b) हिमाद्रि–हिमाचल (c) शिवालिक–हिमाचल (d) कैलाश–नन्दा देवी 👉 उत्तर: (c) शिवालिक–हिमाचल 6. निम्नलिखित में से कौन सा नगर गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है? (a) नैनीताल (b) मसूरी (c) श्रीनगर (d) अल्मोड़ा 👉 उत्तर: (c) श्रीनगर 7. उत्तराखण्ड का कौन सा नगर ‘प्रवेश द्वार’ (Gateway City) के रूप में जाना जाता है? (a) देहरादून (b) हरिद्वार (c) पौड़ी (d) चम्पावत 👉 उत्तर:...

राज्य में पर्यावरण से जुड़े प्रमुख व्यक्ति : MCQ प्रश्नोत्तरी

उत्तराखंड में पर्यावरण से जुड़े प्रमुख व्यक्ति : MCQ प्रश्नोत्तरी UKPSC | UKSSSC | Patwari | Forest Guard | RO-ARO के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न 1. ‘चिपको वूमन’ के नाम से किसे जाना जाता है? A. बौणी देवी B. गौरा देवी C. वन्दना शिवा D. मीरा बहन उत्तर देखें सही उत्तर: B. गौरा देवी व्याख्या: गौरा देवी ने 26 मार्च 1974 को रैणी गांव से चिपको आंदोलन की शुरुआत की। प्रश्न 2. चिपको आंदोलन की मातृ संस्था कौन-सी है? A. पर्वतीय जनजीवन मंडल B. दशौली ग्राम स्वराज्य मंडल C. नवधान्य D. HESCO उत्तर देखें सही उत्तर: B. दशौली ग्राम स्वराज्य मंडल व्याख्या: इसकी स्थापना चण्डी प्रसाद भट्ट ने 1964 में की। प्रश्न 3. ‘हिमालय में महात्मा गांधी का सिपाही’ किसे कहा जाता है? A. गुरु दास अग्रवाल B. सुन्दरलाल बहुगुणा C. धूम सिंह नेगी D. अवधेश कौशल उत्तर देखें सही उत्तर: B. सुन्दरलाल बहुगुणा प्रश्न 4. ‘Staying Alive’ पुस्तक किसने लिखी? A. अरुंधति राय B. वन्दना शिवा C. गौरा देवी D. मीरा बहन उत्तर देखें सही उत्तर: B. वन्दना शिवा प्रश्न 5. ‘जंगली’ उपनाम किस पर्यावरण...

उत्तराखंड की प्रमुख लोक देवियाँ

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चम्पी/चम्पावतीदेवी: चम्पावत के पुरातन शासकों के द्वारा अपनी कुलदेवी/इष्टदेवी के रूप में पूजित चम्पादेवी का देवालय चम्पावत के मुख्यालय में वहां के प्रसिद्ध देवालय बालेश्वर के पीछे स्थित है। झूमादेवी : स्थानीय लोगों द्वारा इष्टदेवी के रूप में पूजित झूमादेवी का देवस्थल चम्पावत जनपद में लोहाघाट से 4-5 किमी० ऊपर की ओर एक पहाड़ी पर स्थित है। हिंगला : हिडिम्बा के हिंगोले (झूले) से सम्बन्ध वहां के लोगों के द्वारा पूजित यह देवस्थल चम्पावत मुख्यालय से 4 कि०मी० में वनाच्छादित पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। खिलपतिदेवी: खिलपतिदेवी के नाम से स्थानीय लोगों द्वारा पूजित अखिलतारिणीदेवी का यह देवस्थल चम्पावत मुख्यालय से 12-13 कि०मी० उत्तर में खिलपति नामक स्थान में स्थापित है। कोटवीदेवी : यह चम्पावत के मुख्यालय से उत्तर-पश्चिम में स्थित सुंई-बिसुंग के लोगों की इष्टदेवी का स्थान कोटालगढ़ है। यहां के पुरातन शासक असुरराज वाणासुर की माता के रूप में इसकी मान्यता के कारण इसका सम्बन्ध आर्येत्तर वर्गीय देवियों से बनता है। हिडिम्बा हिडिम्ब राक्षस की बहिन होने से हिडिम्बादेवी का सम्बन्ध आयेंत्तर जाति राक्...

उत्तराखंड के प्रमुख देवी मंदिर..

चम्पी/चम्पावतीदेवी : चम्पावत के पुरातन शासकों के द्वारा अपनी कुलदेवी/इष्टदेवी के रूप में पूजित चम्पादेवी का देवालय चम्पावत के मुख्यालय में वहां के प्रसिद्ध देवालय बालेश्वर के पीछे स्थित है। झूमादेवी : स्थानीय लोगों द्वारा इष्टदेवी के रूप में पूजित झूमादेवी का देवस्थल चम्पावत जनपद में लोहाघाट से 4-5 किमी० ऊपर की और एक पहाड़ी पर स्थित है। हिंगला : हिडिम्बा के हिंगोले (झूले) से सम्बन्ध वहां के लोगों के द्वारा पूजित यह देवस्थल चम्पावत मुख्यालय से 4 कि०मी० में वनाच्छादित पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। खिलपतिदेवी :  खिलपतिदेवी के नाम से स्थानीय लोगों द्वारा पूजित अखिलतारिणीदेवी का यह देवस्थल चम्पावत मुख्यालय से 12-13 कि०मी० उत्तर में खिलपति नामक स्थान में स्थापित है। कोटवीदेवी : यह चम्पावत के मुख्यालय से उत्तर-पश्चिम में स्थित सुंई-बिसुंग के लोगों की इष्टदेवी का स्थान कोटा लगढ़ है। यहां के पुरातन शासक असुरराज वाणासुर की माता के रूप में इसकी मान्यता के कारण इसका सम्बन्ध आर्येत्तर वर्गीय देवियों से बनता है। हिडिम्बा : हिडिम्ब राक्षस की बहिन होने से हिडिम्बादेवी का सम्बन्ध आर्येत्तर जाति राक्ष...

उत्तराखण्ड के राजनीतिक मंच पर रानियों की भूमिका

1. रानी श्रृंगारमंजरी- उत्तराखण्ड के मध्यकालीन राजनीतिक रंगमंच पर दृष्टिपात करने पर जहां एक ओर गढ़राज्य में अनेक रानियों की सक्रिय भूमिका के उदाहरण मिलते हैं वहां कूर्माचल राज्य में उनकी भूमिका नगण्य रही है। चन्दों के 7-8 वर्षों के इतिहास में राजा दीपचन्द (1748-1777 ई.) की रानी श्रृंगारमंजरी को छोड़कर अन्य किसी का नामोल्लेख तक नहीं मिलता। कोई नहीं जानता कि चन्दवंश के शक्तिशाली गिने जाने वाले शासकों रुद्रचन्द, बाजबहादुरचन्द आदि नरेशों की रानियों का नाम क्या था? यहां की राजनीति तथा प्रशासन में हस्तक्षेप करने वाली अपवादात्मक रानी श्रृंगारमंजरी के विषय में कहा जाता है कि राजा दीपचन्द के जीवनकाल में ही उसकी अनाम पटरानी की मृत्यु हो जाने तथा इधर राज्य के कर्णधार शिवदेव जोशी के मारे जाने पर महत्वाकांक्षी रानी श्रृंगारमंजरी ने प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाने के लिए स्वयं को चन्द शासन की वजीर तथा बख्शी घोषित कर दिया तथा अपने नवजात पुत्र क नाम पर शासनादेश जारी करने प्रारंभ कर दिये। वह राज्य की देखभाल के लिए शिवदेव जोशी द्वारा पहले से नियुक्त उसके पुत्र जयकृष्ण जोशी के कामकाज में भी हस्तक्षेप करने लग...

जोशियाणी कांड

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सन् 1780 में जोशियों के द्वारा प्रद्युम्न को उपर्युक्त रूप से अल्मोड़ा के सिंहासन पर आरोपित कर दिये जाने के बाद उसका भाई पराक्रमसाह भी वहां पहुंच गया। 3-4 साल तक वहां पर रहने के बाद जोशियों ने सन् 1785 में उसमें गढ़वाल का राजा बनने की महत्वाकांक्षा का उभारकर उनके ज्येष्ठ आता जयकृतसाह को गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर करने की दृष्टि से उसके साथ विजयराम नेगी के नेतृत्व में एक सेना भेजकर श्रीनगर पर घेरा डलवा दिया। किन्तु जयकृतसाह के मित्र सिरमौर के राजा जगतप्रकाश ने उसकी रक्षा के लिए अपनी सेना भेजकर कपरोली नामक स्थान पर कुमाउंनी सेना को पराजित करके श्रीनगर में राजा जयकृतसाह को उनके घेरे से मुक्त करा लिया। इस पर प्रद्युम्न तथा पराक्रम दोनों पराजित होकर अल्मोड़ा लौट आये । इसके बाद राजा के मित्र जगतप्रकाश के सिरमौर लौट आने पर षड़यंत्रकारी गढ़मंत्रियों ने प्रद्युम्न-पराक्रम को सूचना भिजवायी कि 'राजा जगतप्रकाश वापस चला गया है और इधर राजा जयकृतसाह आगामी नवरात्रों में राजेश्वरी की पूजा हेतु देवलगढ़ में रहेगा। उस समय वहां पर उसके साथ केवल थोड़े से ही सैनिक रहेंगे। यह आक्रमण के लिए अति ...

एटकिंसन गजेटियर में वर्णित लोक देवताओं का वर्णन यथालिखित पढ़िये.

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क्षेत्रपाल या भूमिया:- क्षेत्रपाल या भूमिया, खेत-खलिहान और सीमाओं का संरक्षक देवता है। यह हितैषी है और किसी को कब्जे में कर, या उसे अथवा उसकी फसल को नुकसान पहुंचाकर अपनी पूजा कराने के लिए बाध्य नहीं करता। हर गांव में उसे समर्पित एक छोटा सा मंदिर होता है जिसका क्षेत्रफल कुछ वर्ग-फीट से ज्यादा नहीं होता। जब फसल बोई जाती है तो खेत के कोने में और इस मंदिर के सामने किसी पत्थर पर मुट्ठीभर अनाज बिखेर दिया जाता है ताकि यह देवता फसल की ओलों, सूखे या जंगली जानवरों से रक्षा करे। फसल कटाई के समय फसल का पहला फल इसे चढ़ाया जाता है ताकि एकत्र किये गए अनाज की चूहों और कीट-पतंगों से रक्षा हो सके। यह दुष्टों को दण्ड और सज्जनों को पुरस्कार देता है। यह गांव का स्वामी है, गांव की समृद्धि में रचि रखता है और शादी-ब्याह, बच्चे के जन्म तथा अन्य उपलब्धि व हंसी-खुशी के मौकों पर चढ़ाई जाने वाली भेंटों का प्राप्तकर्ता साझीदार है। अन्य ग्रामीण देवताओं की तरह उसे शायद ही कभी सालाना बलि दी जाती हो, वह धरती में उपजे फल की विनम्र भेंट से ही संतुष्ट हो जाता है। क्षेत्रपाल का महाजागेश्वर दाननामा से सम्बद्ध ए...

महक़ क्रांति

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उत्तराखंड में "महक क्रांति" योजना के अंतर्गत सुगंधित पौधों की खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न जिलों और घाटियों में बड़े पैमाने पर कार्य किया जा रहा है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य किसानों की आर्थिकी को मजबूत करना और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना है। उत्तराखंड सगंध पौधा केंद्र (Centre for Aromatic Plants - CAP) इस योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यहां कुछ प्रमुख जिले और घाटियाँ हैं जहाँ "महक क्रांति" के तहत कार्य हो रहा है:  लेमनग्रास वैली: देहरादून, हरिद्वार और पौड़ी जिलों में 2400 हेक्टेयर भूमि पर लेमनग्रास की खेती का लक्ष्य रखा गया है। इससे आवश्यक तेल, चाय, अरोमाथेरेपी और कीटाणुनाशक जैसे उत्पाद तैयार किए जाएंगे।  मिंट वैली (जापानी मिंट): हरिद्वार और उधमसिंह नगर में 8000 हेक्टेयर भूमि पर मिंट वैली विकसित की जाएगी। इससे आवश्यक तेल, खाद्य सामग्री, औषधीय उत्पाद और अरोमाथेरेपी के लिए मिंट उत्पाद बनाए जाएंगे। डेमेक्स रोज वैली: चमोली, उत्तरकाशी और अल्मोड़ा जिलों में 2000 हेक्टेयर भूमि पर डेमेक्स गुलाब की खेती का लक्ष्य है। इससे गुलाब जल, गुलाब का तेल...

कुछ लोक गीत और नृत्य

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  बाजू/बाज्यू:- यह दर्शाता है कि कैसे पूर्वजों और देवताओं की वीरता को श्रद्धा और सम्मान के साथ मंत्रों की तरह गाया जाता है, जो इन समुदायों के इतिहास और आध्यात्मिक जुड़ाव को दर्शाता है।   तिमुली/तुबैड़ा: प्रेम और श्रृंगार से संबंधित गीत होना इन गीतों में मानवीय भावनाओं के महत्व को उजागर करता है। डंड्रायाला नृत्य गीत: हाथों में हाथ डालकर स्त्री-पुरुषों द्वारा लयबद्ध तरीके से प्राकृतिक घटनाओं या देवताओं से संबंधित काल्पनिक कथाओं का गायन सामुदायिक जुड़ाव और सामूहिक अभिव्यक्ति का प्रतीक है।   चाखुली-माखूली: "प्रेम प्रधान गीत जो आवेशात्मक रूप से गाया जाता है" यह बताता है कि इन गीतों में भावनाएं कितनी तीव्र और मुखर होती हैं।   ढुसुका: वृत्ताकार रूप से स्त्री-पुरुषों का नृत्यगीत करना समुदाय की एकता और सामूहिक उत्सव का प्रदर्शन करता है।   जुनला ढुसुका: केवल दो व्यक्तियों द्वारा गाए जाने वाले प्रेमवार्ता के वर्णन वाले गीत अंतरंगता और व्यक्तिगत भावनाओं के आदान-प्रदान को दर्शाते हैं।

सुखदेव पांडेय : पहला पद्मश्री पाने वाले उत्तराखंडी

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मूल रूप से अल्मोड़ा जिले के निवासी सुखदेव पांडेय 1893 देहरादून में जन्में. मदन मोहन मालवीय के प्रिय शिष्य सुखदेव पांडेय गणित और भौतिकी ज्यामिति की 4400 शब्दों की शब्दावली लिखी. बीजगणित तथा त्रिकोणमिति की पुस्तकों का प्रणयन कर ख्याति पाने वाले सुखदेव पांडेय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर थे. सुखदेव पांडेय 1956 में उत्तराखंड से पद्मश्री पाने वाले प्रथम व्यक्ति हैं. सुखदेव पांडेय ने अल्मोड़ा से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर इलाहाबाद के म्योर कॉलेज से 1917 गणित में एम.एस.सी उत्तीर्ण की. 1918 में सुखदेव पांडेय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में गणित के सहायक प्रोफेसर बने. सेवाकाल में सुखदेव पांडेय एनसीसी  के कमांडिंग ऑफिसर भी रहे. उन्होंने प्रसिद्ध गणितज्ञ डॉ. गणेश प्रसाद के निर्देशन में शोध कार्य भी किया. सुखदेव पांडेय अपनी प्रतिभा और कर्तव्यनिष्ठा के कारण मदन मोहन मालवीय के बहुत करीब थे। 1929 में बिरला एजुकेशन ट्रस्ट की स्थापना घनश्याम दास बिरला द्वारा शेखावटी, पिलानी, राजस्थान में की गई. इस ट्रस्ट के तहत एक इंटरमीडिएट स्कूल पिलानी में स्थापित करवाया गया था. जी. डी...

हिमालयी जड़ी बूटियाँ

हिमालयी क्षेत्र की जड़ी-बूटियों द्वारा विभिन्न रोगों के उपचार के सम्बन्ध में, यद्यपि विस्तृत जानकारी देना यहाँ पर सम्भव नहीं है फिर भी संक्षिप्त में उदाहरण स्वरूप कुछ जड़ी-बूटियों के वानस्पतिक नाम तथा स्थानीय नामों के साथ उनके उपयोगों का विवरण निम्नवत् है- 1. रत्ती (एब्रस प्रिकेटोरियस) जड़ तथा पत्तियाँ कफ, दमा, ज्वर, तथा चक्कर में लाभप्रद। 2. अतीस (एकोनिटम हट्रोफिलम)- बड़े ज्वर तथा उदर जनित अनेक असाध्य रोगों में रामबाण। 3. लटजीरा (एकाइरेन्थस एसपरा)- बीज, चर्मरोगों, सिर दर्द तथा श्वांस रोग में उपयोगी। 4. बेंत (एगलमार्मेलोस)- पत्तियाँ कृमिनाशक तथा गले के दर्द में काम आती हैं। फल गठिया बात की प्रसिद्ध दवा है। 5. बासिंग (अघैटोडावैसिका)- जड़ें खून की बिमारियों में तथा पत्तियाँ कफ, श्वास तथा रतौंधी में लाभप्रद होती हैं। 6. जम्बू (एलियमस्ट्रोचि) इसकी पत्तियों का नमक के साथ गरम पानी में बनाया गया रस घाव एवं जख्मी अंगों को सेकने के काम में आता है। 7. गंद्रायन (एंगोलिकाग्लाओका)- सुगन्धित जड़ें मशाले के अतिरिक्त पेटदर्द. क्षुधा एवं स्वास्थ्य वर्धक। 8. 8. कुर्चापाती (आर्टीमिसिया ...

बाईस जतकाव

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बाइस जतकाव माने 22 बार सन्तान उत्पत्ति होना। उत्तराखण्डी समाज में कुछ विचित्र की सामाजिक प्रथाएँ भी देखने को मिलती हैं, जैसे - यदि किसी महिला की एक ही पति से 22 संतानें (बाईस जतकाव) पैदा होती हैं तो उस महिला का अपने पति के साथ मकान के छत की धुरी (दोनों ओर की ढालू छत का मिलन बिन्दु) में उनका पुनर्विवाह किया जाता था। जोहार की भोटिया जनजाति में यह पुनर्विवाह 20 संतानोत्पत्ति के बाद होता था। इसी तरह यदि किसी व्यक्ति को मृत समझकर उसकी वैतरणी (कालदान) कर दी गई हो और वह चेतनावस्था में लौटकर पुनः जीवित हो जाय या किसी की मृत्यु की सूचना के आधार पर उसका अंत्येष्टि संस्कार सम्पन्न कर दिया गया हो, लेकिन वह पुनः प्रकट हो जाय तो ऐसे व्यक्ति के नामकरण से लेकर विवाह तक के सभी संस्कार पुनः सम्पन्न करने पड़ते हैं, तभी उसे घर-परिवार के सदस्यों में सम्मिलित किया जा सकता है। डॉ. शेर सिंह बिष्ट जी की पुस्तक कुमाऊँ हिमालय समाज एवं संस्कृति का एक अंश.

राईं गढ़ के नाम पर पड़ा रवाँई

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रवाँई घाटी का पूर्व नाम 'रांई गढ़' था। जो अब हिमाचल प्रदेश का भाग है। यही राई कालान्तर में रवाँई पुकारा जाने लगा। भारत की आजादी के पश्चात गढ़वाल रियासत का 2 अगस्त 1949 को भारतीय संघ में विलय हो गया। और 1960 में टिहरी से उत्तरकाशी को अलगकर सीमान्त जिले का गठन कर दिया गया। इसकी यमुना घाटी में ही रवाँई का विस्तार है। यहां की धार्मिक व सांस्कृतिक परम्पराएं काफी समृद्ध है। रवाँई-जौनपुर व जौनसार-बावर की संरचना, संस्कृति व रीतिरिवाजों में साम्य है इसीलिए अलग-अलग जिलों में फैले इन क्षेत्रों को 'त्रिगुट' यानी एक प्राण, तीन शरीर एक कहा जाता है। मध्य हिमालय क्षेत्र के रवाँई-जौनपुर व जौनसार बावर में आज भी संयुक्त पारिवारिक परम्परा बेहद समृद्ध है, यहां महिलाओं को परिवार में प्रथम दर्जा दिया जाता है जिस कारण इस क्षेत्र में दहेज जैसी कुप्रथा आज तक घुस भी नहीं पाई है। इसीलिए यहां के राजस्व पुलिस व पुलिस थानों में दहेज प्रताड़तना व हत्या के एक घटना ढूंढे नहीं मिलती।    ai निर्मित प्रतीकात्मक फोटो अपनी अनुपम व अद्वितीय छटा के लिए रवाँई-जौनपुर प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध है। रा...

बाड़ाहाट शक्ति स्तंभ

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 विश्वनाथ मंदिर के सामने स्थित है. प्राचीन त्रिशूल (21 फीट ऊंचा) है, जिसमें ब्राह्मी एवं शंख लिपि में लेख प्राप्त हुए हैं. इस त्रिशूल में तीन श्लोक उत्कीर्ण हैं. प्रथम श्लोक में गणेश्वर नरेश द्वारा शिव मंदिर के निर्माण का उल्लेख किया गया है. द्वितीय श्लोक में गणेश्वर के पुत्र श्री गुह का उल्लेख है. तृतीय श्लोक में राजा गुह की शत्रुओं पर विजय करने का उल्लेख है. इस त्रिशूल में अशोकचल्ल द्वारा 1193 ई. में केदार भूमि जीतने का उल्लेख किया गया है.

उत्तराखण्ड का राज्य वृक्ष बुरांस: एक संपूर्ण विवरण

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उत्तराखण्ड की प्राकृतिक सुंदरता का प्रतीक, बुरांस (Rhododendron arboreum) न केवल अपनी सुंदरता के लिए बल्कि पारिस्थितिक, औषधीय और सांस्कृतिक महत्व के लिए भी जाना जाता है । यह उत्तराखण्ड के लोगों के लिए गर्व का विषय है। वैज्ञानिक रूप से ‘रोडोडेन्ड्रोन अरबोरियम’ कहलाने वाला बुरांस , स्थानीय बोलियों में बुरांश, लाल बुरांश, ब्रास या बरह-के-फूल जैसे नामों से भी जाना जाता है । बुरांस पूरे हिमालयी क्षेत्र और पड़ोसी देशों में 800 से 3000 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है । भारत के अलावा, यह भूटान, चीन, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड, पाकिस्तान और तिब्बत में भी मिलता है । स्थानीय तौर पर बुरांश के फूल को कफ्फू फूल भी कहा जाता है। हालांकि कफ्फू शब्द का प्रयोग उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में मोनाल के लिए किया जाता है। सम्भवतः कफ्फू का प्रिय भोजन होने के कारण इसे भी कफ्फू फूल कहा गया हो। बुरांस: वानस्पतिक विशेषताएं बुरांस एक सदाबहार झाड़ी या छोटा पेड़ है, जो आमतौर पर 12 मीटर तक ऊंचा होता है । इसके पत्ते गहरे हरे, चमड़े जैसे और 7 से 19 सेमी लंबे होते हैं, जिनकी निचली सतह पर हल्के भूरे र...

अस्कोट-आराकोट अभियान सम्पूर्ण विवरण

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अस्कोट-आराकोट अभियान उत्तराखंड की एक ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण पदयात्रा है, जो हिमालयी समाज, पर्यावरण और संस्कृति को गहराई से समझने का प्रयास करती है।  यह अभियान हर दस वर्षों में आयोजित होता है और 2024 में इसकी छठी यात्रा का आयोजन हुआ, जो इस अभियान की 50वीं वर्षगांठ भी थी।  अस्कोट-आराकोट अभियान: बिंदुवार विवरण 1. उत्पत्ति और प्रेरणा इस अभियान की शुरुआत 25 मई 1974 को श्रीदेव सुमन की जयंती पर हुई थी। गांधीवादी पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा की प्रेरणा से इस यात्रा की रूपरेखा तैयार की गई थी, जिसमें कुमाऊँ और गढ़वाल विश्वविद्यालयों के छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने भाग लिया।  2. यात्रा मार्ग और विस्तार अभियान की शुरुआत पिथौरागढ़ जिले के पांगू-अस्कोट से होती है और यह उत्तरकाशी जिले के आराकोट में समाप्त होता है। यह यात्रा लगभग 1150 किलोमीटर लंबी होती है और उत्तराखंड के 7 जिलों—पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, उत्तरकाशी और देहरादून—के लगभग 350 गांवों से होकर गुजरती है। यात्रा के दौरान पदयात्री 35 नदियों, 16 बुग्यालों, 20 खरकों...